क्या आप जानते हे कैसे हुई थी हिमालय की उत्पती ?

लाखों वर्षो पहले की बात है जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषशायी हुआ करते थे, उसी समय उस सागर में एक समुद्री चिड़िया का दम्पति रहता था. मादा चिड़िया हर साल समुद्र के किनारे अंडे देती थी लेकिन हर बार समुन्द्र उन अन्डो को अपने थपेड़ो से नष्ट कर देता था.

काफी समय तक जब ऐसा ही चलता रहा तो समुद्री चिड़िया के उस जोड़े ने भगवान विष्णु को अपना दुखड़ा कह सुनाया, उनकी करुण पुकार सुन विष्णु जी का दिल भर आया और उन्होंने समुन्द्र के पुरे जल को निगल लिया. समुन्द्र से जब पूरा जल समाप्त हो गया तो जो भू भाग बना उसे ही हम आज धरती माता के नाम से जानते है.

समुन्द्र को निगलने पर भगवान को सुस्ती आई और वो गहरी नींद में सो गए, लेकिन तब ऋषि कश्यप और दिति( दक्ष कन्या) का पुत्र असुर हिरण्याक्ष वंहा आ धमका. वो सोने का शौकीन था इसलिए उसने धरती से सोना निकलना शुरू किया, उसने इतना सोना निकल लिया की धरती के कई भाग अपनी कक्षा से उठने लगे.

उन उठे हुए भूभाग का ढेर अंत में हिमालय का रूप ले चूका था, पर तब हिरण्याक्ष ने धरती को लेजके समुन्द्र ताल में छुपा दिया. तब भगवान विष्णु की नींद खुली और उन्होंने हिरण्याक्ष से युद्ध किया, ये युद्ध एक हजार साल चला अंत में असुर परास्त हुआ और भगवान विष्णु के हाथो मारा गया.

इस प्रकार धरती और हिमालय का निर्माण हुआ जो कालांतर में आज का स्वरुप ले चुके है, उसके बाद ब्रह्मा ने धरती को इंसानो के रहने लायक बनाया. अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु ने अपने मानस पुत्रो सप्त ऋषियों और दस प्रजापतियों का निर्माण किया और उन्हें धरती पर रहने भेजा.

उसी दौरान ही समुन्द्र मंथन भी हुआ था जिसमे पर्वत के घर्षण को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने कुर्मा( कछुआ) अवतार लिया. 1728000 साल बाद जब सतयुग का अंत हुआ तो सप्तऋषियों और मनु को बचने के लिए भगवान विष्णु ने मतस्य अवतार लिया. दुनिया के पौराणिक इतिहास को जानने के लिए जुड़े रहे हमारे साथ.

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