जानिए इस पुराण को जिसमे 18 पुराण का सार दिया गया हे

श्रीमद भागवत पुराण और विष्णु पुराण की तरह ही नारद पुराण में विष्णु भक्ति होने के कारण इसे वैष्णव पुराण कहा जाता है। यह एकमात्र पुराण हैं जिसमें संपूर्ण पुराणों का सार समाहित है।

नारद पुराण मे श्लोकों की संख्या 25,000 है। संपूर्ण पुराण दो खंड़ों, पूर्व भाग और उत्तर भाग में बंटा है। पूर्व भाग में 125 अध्याय हैं, उत्तर भाग में 82 अध्याय हैं। इस तरह से संपूर्ण नारद पुराण 207 अध्यायों में वर्णित है।

पूर्व भाग:

पूर्व भाग में सबसे पहले नारद पुराण के महत्व और भगवान विष्णु की भक्ति की महिमा के बारे में बताया गया है। इसमें भारक की पौराणिक, भौगोलिक स्थिति प्रयाग, काशी, गंगा और गायत्री मंत्र की महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया है।

नारद पुराण के 16वें अध्याय में मार्गशीर्ष से लेकर कार्तिक मास तक के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के व्रतों का विष्णु मंत्रों और पूजन विधि द्वारा वर्णन किया गया है।

इसी पुराण में 19वें अध्याय में समस्त कष्टों का अंत कर भोग, ऐश्वर्य तथा मोक्ष प्रदान करने वाले परम कल्याणकारी एवं दुर्लभ हरिपंचक व्रत का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु का सबसे प्रिय व्रत यही माना गया है।

उत्तर भाग:

इस भाग में महर्षि वशिष्ठ और मान्धाता ऋर्षि का आख्यान वर्णित है। उत्तर भाग के 46वें अध्याय से 53वें अध्याय तक वेदांगों का वर्णन मिलता है। वेदांगों यानी वेदों के अंग(विषय) से है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छंद इन्हें ही वेदों के छः अंग कहा गया है।

यदि आप वेदों के रहस्य को जानना चाहते हैं तो आपको वेदांगों को जानना अत्यंत ही आवश्यक है। वेदों के प्रथम अंग शिक्षा के अंतर्गत स्वर को समस्त वेदांगों में प्रधान कहा गया है। वेदों के दूसरे अंग कल्प के अंतर्गत हवन यज्ञादि अनुष्ठानों का वर्णन किया गया है।

52वें अध्याय में तीसरे वेदांग व्याकरण का वर्णन है। इसमें व्याकरण के शब्दों के रूप, उनकी सिद्धि आदि के बारे में बताया गया है। इसके बाद वेद के चौथे अंग निरुक्त का वर्णन मिलता है।

ज्योतिष को पांचवां अंग माना गया है। इसके बाद 6वें अंतिम वेदांग छंद का वर्णन है। इसके अंतर्गत वैदिक तथा लौकिक छंदों के लक्ष्णों का वर्णन है। वेदों को छन्दास भी कहा जाता है। क्योंकि छंदों के बिना वेदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ नहीं हो सकता।

68वें अध्याय में भगवान विष्णु से संबंधित अष्टाक्षर, द्वादशाक्षर, आदि मंत्रों का अनुष्ठान-विधि सहित वर्णन है। 74वें अध्याय में रुद्रावतार हनुमानजी की उपासना से संबंधित मंत्रों और भूत-प्रेत विनाशक मंत्रों का उल्लेख मिलता है।

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