प्रभु श्रीराम के राजतिलक के वक़्त लक्ष्मण जी क्यू हसने लगे थे ?

मौका था राम के राजतिलक का। सभागृह खचाखच भरा हुआ था। इंतजार की घड़ियां बस खत्म होने ही वाली थीं कि लक्ष्मण ने हंसना शुरू कर दिया। हरेक की नजर लक्ष्मण की तरफ थी।

हरेक इस बात से हैरान था कि आखिर लक्ष्मण हंस क्यों रहे हैं? क्या वे अयोध्या पर हंस रहे थे? क्या वे इस महल की राजनीति पर हंस रहे थे, जो 14 साल तक चरण-पादुका के भरोसे रही? क्या वे कौशल्या पर हंस रहे थे, जो राम के राजा बनने का सपना देखती थीं?

या फिर कैकयी पर… कि तमाम कोशिशों के बाद भी वे राजमाता होने का ख्वाब पूरा नहीं कर पाई थीं? या फिर भरत पर, जिसने राजा होने का अवसर गंवा दिया था? या फिर वे अपनी ही मां सुमित्रा और भाई शत्रुघ्न पर हंस रहे थे, जिन्होंने बिना किसी अपेक्षा के जीवन भर सेवा धर्म निभाया?

क्या वे सुग्रीव पर हंस रहे थे जिसने भाई की हत्या के लिए राम का सहारा लिया या फिर या फिर विभीषण पर, जिसने अपने भाई के दुश्मन का साथ दिया और इस वजह से राजा बना?

या फिर जांबवंत पर जो उम्रदराज होने के बावजूद हमेशा हनुमान की छाया के कैदी रहे? या फिर हनुमान पर… जो राम की पत्नी के लिए बिना किसी अपेक्षा के अपनी पूंछ जला बैठे? क्या वे सीता पर हंस रहे थे जिन्हें अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा?

लेकिन इनमें से कुछ भी ऐसा नहीं था, जिस पर लक्ष्मण हंस रहे थे। वे एक विडंबना पर हंस रहे थे। उन्हें निद्रा नजर आ रही थी… निद्रा की देवी उनकी तरफ बढ़ रही थी। 14 साल पहले उन्होंने भाई राम और भाभी सीता की देखभाल के लिए निद्रा से विनती की थी वे उसे अकेला छोड़ दें।

14 साल लक्ष्मण ने एक ही सपना देखा था: अपने प्रिय भाई राम का राज्यारोहण… आज वह दिन है और अब लक्ष्मण मुक्त हैं। अब तक निद्रा ने उनकी विनती मानी थी और अब खुद लक्ष्मण को निद्रा की जरूरत है।

लेकिन सवाल उठता है कि लक्ष्मण के हंसने से सारे लोग इतने व्यग्र क्यों हो गए? इतनी असुरक्षा कैसे पैदा हो गई? इसलिए क्योंकि हंसी एक तरह की शक्ति है। जब हम किसी पर हंसते हैं, तो हम खुद को सुरक्षित, भयमुक्त यहां तक कि शक्तिशाली महसूस करते हैं। जब कोई हम पर हंसता है, तो हम अपमानित, दमित, असुरक्षित यहां तक कि शक्तिहीन महसूस करते हैं।

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