ध्रुव ने जन्म लिया था सतयुग मे तो केसे जपा द्वापर युग का ये मंत्र ?

भक्त ध्रुव की कथा तो हिंदुस्तान के बच्चे बच्चे को मालुम है लेकिन वो असल में भक्त नहीं बल्कि सच्चे क्षत्रिय थे. क्षत्रिय का स्वाभाव है की वो किसी का ताना बर्दाश्त नहीं कर सकते, जब सौतेली माँ ने उन्हें ताना मारा तो वो क्रोध में वन में चले गए थे भगवान् को प्रसन्न कर वरदान में परम् पद प्राप्त करने के लिए.

तब उन्हें नारद ऋषि मिले जिन्होंने उसे समझाया लेकिन क्षत्रिय का स्वाभाव ही ऐसा होता है की बच्चा होने पर भी वो नहीं समझे. तब नारद जी ने उन्हें “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” का मन्त्र दिया जिसे जप कर मात्र 6 महीने में ही उन्होंने भगवान् को प्रकट होने पर मजबूर कर दिया था.

अगर आप वसुदेव के पुत्र होने के चलते श्री कृष्ण को वासुदेव समझते है तो आप इन्ही गलत है और ये ही आपके इस संशय का समाधान भी है. वासुदेव का अर्थ होता है जो नारायण से नर का अवतार लेता है, नारायण यानी क्षीर सागर के जल में शेष पर सोये भगवान् जो की समय समय पर नर के रूप में अवतार लेते है.

इस मन्त्र में वासुदेव का अर्थ ये ही है, और जंहा तक संशय है कृष्ण के जन्म से पहले वासूदेव के नाम का मन्त्र बनाने की तो ये भी जान ले की भगवान् का जन्म होने से काफी समय पहले ही उनकी पटकथा तैयार हो जाती है. इसको और सटीक तरह से समझने के लिए आप भगवान् कल्कि अवतार को ही उदाहरण में ले.

उनका जन्म इस कलियुग के अंत में होना है लेकिन उनकी जन्म की तिथि, नक्षत्र और स्थान सब अभी से तय है और शाश्त्रो में लिखा हुआ है, है की नहीं. राजा हरिश्चंद्र ने अपने पूर्व जन्म में जन्माष्टमी का व्रत कर उस जन्म में सतगुण का फल पाया था, राम जी को ऋषि वशिष्ठ ने श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को कही गई गीता उनके बचपन में ही सुना दी थी.

मतलब जन्म तो होता है बाद में हमारी और भगवान् की भी जीवन की पटकथा पहले ही लिख दी जाती है….हर हर महादेव

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