भक्त गज को क्यू बचाया था भगवान ने जाने उसकी पूर्व जन्म की कथा से

“एक हाथी तालाब में पानी पिने गया, वंहा उसका पेअर एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया तब उसने भगवान् को पुकार लगाई और भगवान् ने आकर मगर की गर्दन काट उसे मुक्त करवाया.” भक्त गज की ये कथा सुनी होगी आपने जो की शाश्त्रो में लिखी है लेकिन इसके अलावा किसी भी जानवर भक्त की ऐसी कहानी अपने और सुनी है क्या?

धरती पर जीवो की 84 लाख यौनिया बताई गई है जिसमे से तिर्यक योनि में पेड़ पौधे और जानवर शामिल है वंही दूसरी है मनुष्य योनि. तिर्यक योनिया सिर्फ अपने कर्मो के फल को भुगतने के लिए ही आती है उन्हें पाप और पुण्य का फल नहीं मिलता है, वंही मनुष्य ही सिर्फ कर्म करने में सक्षम है उसे ही पाप पुण्य लगते है तीर्यको को नहीं.

ऐसे में कैसे सम्भव है की एक जानवर (गज) संकट में पड़ने पर भगवान् को पुकारे और भगवान् मदद के लिए आ भी जाए? इस संशय को समझने के लिए हमें जाननी होगी उस गजराज और मगर की पूर्ण जन्म की कथा जिसके चलते उनमे ऐसा सामर्थ्य आया को वो भगवान् के भक्त हुए.

जाने गज के पूर्व जन्म की कथा…

वो मगर जिसने गज (हाथी) को दबोचा था एक श्रापित गन्धर्व था जिसकी भगवान् के हाथो मरने से मुक्ति हो गई थी श्राप से और वो गज असल में पूर्व जन्म में ओडिशा का एक राजा था. इस राजा का नाम था इन्द्रद्युमय जिसने की जगनाथ पूरी में कंही और से मुर्तिया लाकर जगन्नाथ मंदिर मंदिर बनवाया था.

राजा बहुत दयालु धार्मिक, दानवीर और यज्ञ तप करने वाला और न्याय संगत प्रजा पालन करने वाला था! लेकिन राजा सकाम कर्म करता था शायद उसके पास कोई ज्ञानी गुरु नहीं था नहीं तो वो ऐसा नहीं करता, सकाम कर्म का अर्थ यह पुण्य की आशा से कर्म करना जिससे स्वर्ग मिले.

लेकिन उसे ये पता नहीं था की स्वर्ग भी स्थिर नहीं है पुण्य खत्म होते ही फिर धरती पर जन्म लेना पड़ेगा और इसलिए वो ऐसे ही कर्म करता गया. मौत के बाद वो स्वर्ग गया वंहा अनंत वर्षो तक भोग किया लेकिन उसके बाद उसे धरती पर आना पड़ा उस समय उसे सफेद हाथी का जन्म मिला था जो की लंका के त्रिकूट पर्वत पर अपनी हथनियो के साथ मजे से रहता था.

स्वर्ग भोग कर आये मनुष्यो में ये गुण होते है की वो सतगुणी ही होते है, भले ही वो हाथी हो गए लेकिन सतगुण उसमे विधमान थे और इसी के चलते वो नदी के जल से सूर्य को अर्घ देकर देवपूजा करता था. जब मगर ने उसका पैर पकड़ा तो पहले उसने अपनी पूरी ताकत लगाई छूटने की.

भागवत कथा के अनुसार 1000 वर्षो तक उसमे और मगर में खींचतान चलती रही लेकिन जब हाथी थक गया और मौत सामने देखि तो उसने पूर्व जन्मो के कर्मो के चलते भगवान् को याद किया और भगवान् तो सच्चे मन से पुकारने पर पहुँच ही जाते है.

सिख ये ले की अगर आप बिना किसी फल के आशा के अच्छे काम नहीं कर सके, फल की आशा से भी अच्छे काम करे तो भी आपका कल्याण मार्ग प्रसस्थ होगा.

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